वार्णिक छंद में वर्णों की गणना

 

वार्णिक छंद में वर्णों की गणना –

छंदशास्त्र में सम्पूर्ण कार्य गुरु लघु से ही चलता है मात्रिक तथा वार्णिक गण भी इन्हीं के मेल से सिद्ध होते हैं। गुरु और लघु की मिलकर तीन ही मात्राएँ होती हैं। जैसे राम 3 मात्रा।

 गणना को सुगम बनाने के लिए इसे गण आधार पर विभाजित किया गया है। (I) से लघु तथा (S) से गुरु का बोध होता है।  सभी गण तीन वर्णों के मेल से बने हैं –

 

गण नाम

रेखारूप

वर्णरूप

लघुसंज्ञा

उदाहरण

मगण

SSS

मातारा

गोहाना

यगण

ISS

यमाता

गुलाना

रगण

SIS

राजभा

साँवली

सगण

IIS

सलगा

ललिता

तगण

SSI

ताराज

भावेश

जगण

ISI

जभान

सुरेश

भगण

SII

भानस

काजल

नगण

III

नसल

तपन

 

तीन वर्णों के समूह जिसे गण कहा गया है, इन्हें याद रखने का सरल सूत्र है –

“यमाताराजभानसालगा” इस सूत्र के अंत में आए “लगा” में ल लघु को प्रदर्शित करता है जबकि गा गुरु को प्रदर्शित करता है।

गणों में भी आदिविद्वानों शुभाशुभ गणों की चर्चा की है किन्तु मुझे लगता है वार्णिक छंदों की रचना के लिए वर्ण संख्या की गणना इतनी जानकारी से सुगम हो सकेगी।

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~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’


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