अहीर या अभीर
यह
11 मात्राओं का सम-मात्रिक छंद है। अतः इसके प्रत्येक चरण में दोहे के सम चरणों की
तरह 11 मात्राएँ होती हैं, किन्तु इसमें यह अन्तर है कि प्रत्येक चरण का अंत ‘जगण’
अर्थात् लघु गुरु लघु (lSl) से होगा। इसके
प्रथम एवं द्वितीय तथा तृतीय और चतुर्थ चरणों में तुकांतता पायी जाती है।
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शीतल
बहे समीर, करता कलकल नीर।
आया
सावन मास, वारिद लिए अधीर।।
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गूँज
रहा खग गान, मीठी कोकिल तान।
पीं-पीं करे
मयूर, वन-वन दूर सुदूर।।
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अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
शिव
यह भी 11 मात्राओं का सम-मात्रिक
छंद है. इसके प्रत्येक चरण का अतं सगण, रगण या नगण से ही मान्य है। इस छंद के
प्रथम एवं द्वितीय तथा तृतीय एवं चतुर्थ चरण के मध्य तुकांतता पायी जाती है। इसकी
तीसरी, छठी एवं नवीं मात्रा सदैव लघु रहती है।
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कृष्ण
राधिका जहाँ, प्रेम क्यों न हो वहाँ।
क्यों
न प्रीति रंग हो, क्यों नहीं उमंग हो।।
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मित्र भोर हो गया, दिवस आ गया नया।
स्वच्छ
हो गया गगन, बाग़ में खिले सुमन।।
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अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
भव
यह
11 मात्राओं का सम-मात्रिक छंद है। इसके प्रथम-द्वितीय एवं तृतीय-चतुर्थ चरणों के
मध्य तुकांतता होती है। इस छंद के चरणान्त में गुरु (S) अथवा यगण (ISS) होता है।
राम
स्मरण तुम्हारा, एक प्रबल सहारा।
साथ बने
डगर में, वन आँगन नगर में।।
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डरो
नहीं मौत से, जीवन की सौत से।
यह
कटार झुलाए, रहो इसे भुलाए।।
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अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’